‘अधिकारी’ शब्द का ‘लोक सेवक’ शब्द से विस्थापन: नौकरशाही की मानसिकता में परिवर्तन का प्रशासनिक, संवैधानिक और सामाजिक विश्लेषण
Manuscript Title
‘अधिकारी’ शब्द का ‘लोक सेवक’ शब्द से विस्थापन: नौकरशाही की मानसिकता में परिवर्तन का प्रशासनिक, संवैधानिक और सामाजिक विश्लेषण
पीएचडी शोधार्थी - नरेंद्र कुमार
लोक प्रशासन, वीर कुंवर सिंह विश्विद्यालय आरा, बिहार।
Email narendrascp86@gmail.com
सारांश
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में "अधिकारी" शब्द से "लोक सेवक" शब्द की ओर वैचारिक, भाषिक और संस्थागत परिवर्तनों का विश्लेषण यह शोध-पत्र करता है। अध्ययन का मूल तर्क यह है कि प्रशासनिक भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है; यह संस्थागत आचरण, सार्वजनिक नैतिकता, शक्ति-संबंध और नौकरशाही की आत्म-छवि भी बनाती है। “अधिकारी” शब्द अक्सर भारतीय जनमानस में पद, अधिकार, आदेश, दूरी और नियंत्रण की कल्पना करता है, जबकि “लोक सेवक” शब्द नागरिक-केंद्रित उत्तरदायित्व, सेवा, संवेदनशीलता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक विनम्रता का संकेत देता है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने प्रशासन को नागरिक-केंद्रित शासन, समानता, जीवन और गरिमा, सामाजिक न्याय और लोककल्याण के लिए पुनर्परिभाषित किया, लेकिन औपनिवेशिक प्रशासन की पदानुक्रमिक संस्कृति, लालफीताशाही और सत्ता-केंद्रित व्यवहार अभी भी दिखाई देते हैं (भारत का संविधान, 1950/2024; एपलबी, 1953)। यह अध्ययन द्वितीयक स्रोतों पर आधारित एक गुणात्मक-विश्लेषणात्मक प्रणाली का उपयोग करता है और वेबरियन नौकरशाही, नव लोक प्रशासन, सुशासन, लोक सेवा नैतिकता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के सैद्धांतिक आधारों का विश्लेषण करता है। अध्ययन ने पाया कि शब्द-परिवर्तन सार्थक नहीं होगा जब वह प्रशिक्षण, कार्यालयी व्यवहार, सेवा वितरण, प्रदर्शन का मूल्यांकन, नागरिक प्रतिक्रिया और नैतिक जवाबदेही के संस्थागत परिवर्तन से जुड़ सके। यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र में प्रशासनिक संस्कृति का पुनर्निर्माण “लोक सेवक” की अवधारणा पर निर्भर है।
मुख्य शब्द
लोक सेवक; अधिकारी; नौकरशाही; प्रशासनिक मानसिकता; सुशासन; नागरिक-केंद्रित प्रशासन; लोक सेवा नैतिकता