Battle of Beha: The Story of Gallantry of Baghpat in Revolution of 1857. बेहा का युद्वः 1857 की क्रान्ति में बागपत की र्शोय गाथा
Battle of Beha: The Story of Gallantry of Baghpat in Revolution of 1857. बेहा का युद्वः 1857 की क्रान्ति में बागपत की र्शोय गाथा
Mohit1, Dr Renu Jain2
1Research scholar History, IIMT University, Meerut, U.P.
drmohittyagig@gmail.com
2Associate Professor History, IIMT University, Meerut, U.P.
renu_soah@iimtindia.net
सार संक्षेपः-
बागपत जिसे कभी व्याघ्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था अर्थात बाघो (शेरो) की भूमि। जिस भूमि ने हमेशा शेरो को जन्म दिया हो वह पावन भूमि बागपत कहलाती है। समय के साथ नाम भले ही परिवर्तित हो गया हो परन्तु आज भी यह बागपत की धरा शेरो को ही जन्म देती है। यह बात 1857 की क्रान्ति में यहा के शेर दिल किसानो ने साबित की थी। उन्होने अपने पराक्रम से बागपत को अंग्रेजों से मुक्त करा कर ये बता दिया कि क्यो यहा के लोगो ने 12वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक के संघर्षमय काल में भी कभी हार को अपने पास नही आने दिया। चोटे जरूर खायी, पर फिर उठ खड़े होने का साहस उन्हें दूसरो से अलग बनाता हैं। इसलिए यह भूमि क्रांतिवीरों की लंबी श्रृंखला को भी जीवंतता दे रही है। अंग्रेजों के शोषण व अत्याचारों से रोष में आये भारतवर्ष के लोगों ने पहली बार एक बड़े पैमाने पर विदेशी शासन को भारत से उखाड फेंकने की पुरजोर कोशिश की थी। 10 मई 1857 को मेरठ की उग्र व पावन भूमि से अंग्रेजो के विरूद्व इस महान क्रांति का प्रस्फुटन हुआ। उस समय मेरठ का ही अंग रहे वर्तमान जनपद बागपत के क्रांतिवीर सेनानियों, साधारण किसानो व मजदूरो ने बढ-चढ कर भाग लिया। अगर इन महान लोगो की सहभागिता पर प्रकाश डाला जाये तो इस क्षेत्र की जनता द्वारा बहुत ही तीव्र और मजबूत तरीके से अंग्रेजो पर आघात किया गया था। इन बागपत के वीरो की वीरता, साहस, और प्रचंडता ऐसी थी कि शत्रु अंगेज भी इनकी प्रशंसा करने से खुद को नही रोक सकें।
बीज शब्द - महासमर, वीरता, किसान, व्याघ्रप्रस्थ